पश्चिम बंगाल के धान में बढ़ रहा है आर्सेनिक प्रदूषण : अध्ययन

हाल ही में किये गए एक अध्ययन के अनुसार बंगाल के धान में आर्सेनिक प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। आर्सेनिक जमाव धान के प्रकार और फसल चक्र की स्टेज पर निर्भर करता है।

मुख्य बिंदु

यह अध्ययन उपभोग किये जाने वाले दो प्रमुख प्रकार – मिनीकिट और जया पर किया गया। इस अध्ययन में यह पाया गया कि ‘जया’ आर्सेनिक के प्रति अधिक प्रतिरोधी है। इस अध्ययन में वह सभी प्रक्रियाएं दर्शायी गयी हैं जिनसे सिंचाई के द्वारा आर्सेनिक का संचरण होता है।

इस अध्ययन में पाया गया आर्सेनिक प्रदूषण अन्य पुराने अध्ययनों से काफी अधिक है। इस अध्ययन के अनुसार आर्सेनिक की मात्रा धान की जड़ में अधिक होती है, यह मात्रा धान के प्रकार के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। धान के शुरूआती 28 दिनों में आर्सेनिक की मात्रा सबसे अधिक थी, जबकि दूसरे चरण (29-56 दिन) के दौरान यह कम थी, इसके बाद धान पकने के दौरान आर्सेनिक का स्तर पुनः बढ़ गया।

आर्सेनिक विषाक्तीकरण  

आर्सेनिक पृथ्वी की उपरी सतह पर पाया जाने वाला प्राकृतिक तत्व है। यह अजैविक अवस्था में काफी विषैला होता है। लम्बे समय तक घुलनशील अजैविक आर्सेनिक के शरीर में जाने से अर्सेनिकोसिस, डायबिटीज तथा कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं। भारत में पश्चिम बंगाल और उसके पड़ोसी राज्यों में आर्सेनिक प्रदूषण की समस्या काफी बड़ी है। पश्चिम बंगाल के 8 जिलों के 83 खंड में भूमिगत जल आर्सेनिक से दूषित है। मालदा, मुर्शिदाबाद और नादिया जिलों में आर्सेनिक का स्तर सर्वाधिक है।

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